संविधान के अनुच्छेद 21: 'त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई' के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन
गंभीर या पुराने मामलों का निचली अदालत समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करने की हिदायत
न्याय को अनिश्चितकाल तक लटका कर नहीं रखा जा सकता, संवैधानिक गारंटी के खिलाफ हैलखनऊ: 18 जुलाई 2026
कानपुर: 18जुलाई 2026
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने जुलाई 2026 में एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि 'तारीख पर तारीख' का सिलसिला देश की आपराधिक न्याय प्रणाली की पहचान नहीं बन सकता. जस्टिस राजीव भारती की एकल पीठ ने उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से जुड़े वर्ष 2001 के एक कथित अपहरण मामले की सुनवाई के दौरान यह बात कही.
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि किसी आपराधिक मुकदमे को दो दशकों से अधिक समय तक लंबित रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए 'त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई' के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है. इस ऐतिहासिक फैसले और मामले से जुड़ी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं: मामले की मुख्य पृष्ठभूमि और कोर्ट का फैसला मामले की अवधि: यह मुकदमा बहराइच के पयागपुर थाने में साल 2001 में दर्ज कराया गया था, जो करीब 25 वर्षों से कोर्ट में लंबित था. बदली हुई परिस्थितियाँ: सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जिस लड़की के अपहरण का मामला दर्ज हुआ था, वह अपनी मर्जी से आरोपी (अजय कुमार) के साथ गई थी. दोनों ने बाद में शादी कर ली और वर्तमान में उनके तीन बच्चे हैं तथा वे एक खुशहाल जीवन बिता रहे हैं. कोर्ट का कड़ा रुख: कोर्ट ने पाया कि दो दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में मामले में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई, जिससे यह कानूनी प्रक्रिया महज एक 'औपचारिकता' बनकर रह गई.
अग्रिम जमानत: इस स्थिति को देखते हुए हाई कोर्ट ने दोनों आरोपियों (अजय कुमार और रामचंद्र) की अग्रिम जमानत अर्जी स्वीकार कर ली और उन्हें दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया. अदालत की टिप्पणियों के प्रमुख बिंदु संविधान का उल्लंघन: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय को अनिश्चितकाल तक लटका कर नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह संवैधानिक गारंटी के खिलाफ है. ट्रायल कोर्ट को निर्देश: अदालत ने निचली अदालतों को ऐसे गंभीर या पुराने मामलों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करने की हिदायत दी है. पॉपुलर कल्चर का जिक्र: कोर्ट ने प्रसिद्ध फिल्म 'दामिनी' के 'तारीख पर तारीख' वाले जुमले का संदर्भ लेते हुए कहा कि अंतहीन स्थगन और संस्थागत सुस्ती न्याय व्यवस्था की छवि को नुकसान पहुँचाती है. यह मामला भारतीय न्यायपालिका में लंबित मुकदमों (Pending Cases) की गंभीर स्थिति और आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच के संतुलन पर एक बेहद जरूरी कानूनी विमर्श खड़ा करता है.
गंभीर या पुराने मामलों का निचली अदालत समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करने की हिदायत
न्याय को अनिश्चितकाल तक लटका कर नहीं रखा जा सकता, संवैधानिक गारंटी के खिलाफ हैलखनऊ: 18 जुलाई 2026
कानपुर: 18जुलाई 2026
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने जुलाई 2026 में एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि 'तारीख पर तारीख' का सिलसिला देश की आपराधिक न्याय प्रणाली की पहचान नहीं बन सकता. जस्टिस राजीव भारती की एकल पीठ ने उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से जुड़े वर्ष 2001 के एक कथित अपहरण मामले की सुनवाई के दौरान यह बात कही.
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि किसी आपराधिक मुकदमे को दो दशकों से अधिक समय तक लंबित रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए 'त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई' के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है. इस ऐतिहासिक फैसले और मामले से जुड़ी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं: मामले की मुख्य पृष्ठभूमि और कोर्ट का फैसला मामले की अवधि: यह मुकदमा बहराइच के पयागपुर थाने में साल 2001 में दर्ज कराया गया था, जो करीब 25 वर्षों से कोर्ट में लंबित था. बदली हुई परिस्थितियाँ: सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जिस लड़की के अपहरण का मामला दर्ज हुआ था, वह अपनी मर्जी से आरोपी (अजय कुमार) के साथ गई थी. दोनों ने बाद में शादी कर ली और वर्तमान में उनके तीन बच्चे हैं तथा वे एक खुशहाल जीवन बिता रहे हैं. कोर्ट का कड़ा रुख: कोर्ट ने पाया कि दो दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में मामले में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई, जिससे यह कानूनी प्रक्रिया महज एक 'औपचारिकता' बनकर रह गई.
अग्रिम जमानत: इस स्थिति को देखते हुए हाई कोर्ट ने दोनों आरोपियों (अजय कुमार और रामचंद्र) की अग्रिम जमानत अर्जी स्वीकार कर ली और उन्हें दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया. अदालत की टिप्पणियों के प्रमुख बिंदु संविधान का उल्लंघन: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय को अनिश्चितकाल तक लटका कर नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह संवैधानिक गारंटी के खिलाफ है. ट्रायल कोर्ट को निर्देश: अदालत ने निचली अदालतों को ऐसे गंभीर या पुराने मामलों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करने की हिदायत दी है. पॉपुलर कल्चर का जिक्र: कोर्ट ने प्रसिद्ध फिल्म 'दामिनी' के 'तारीख पर तारीख' वाले जुमले का संदर्भ लेते हुए कहा कि अंतहीन स्थगन और संस्थागत सुस्ती न्याय व्यवस्था की छवि को नुकसान पहुँचाती है. यह मामला भारतीय न्यायपालिका में लंबित मुकदमों (Pending Cases) की गंभीर स्थिति और आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच के संतुलन पर एक बेहद जरूरी कानूनी विमर्श खड़ा करता है.
