सुप्रीम कोर्ट निर्णय: यात्री शव के पास टिकट न मिलना मुआवज़ा न देने का आधार नहीं

रेलवे अधिनियम को कल्याणकारी कानून मानते हुए पीड़ित परिवारों को बड़ी कानूनी राहत
केवल शव के पास भौतिक टिकट न मिलने से यात्री का 'वास्तविक यात्री' होने का दर्जा खत्म नहीं
शब्द 'सेकंड क्लास पैसेंजर' मानवीय गरिमा और संविधान के खिलाफ: 'सेकंड क्लास कोच' करने का सुझाव

महत्व: यह फैसला रेलवे दुर्घटना पीड़ित परिवारों के लिए राहतकारी है। सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला रेलवे अधिनियम को एक कल्याणकारी कानून मानते हुए पीड़ित परिवारों को बड़ी कानूनी राहत देता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 17 जुलाई 2026 को स्पष्ट किया कि केवल शव के पास भौतिक टिकट न मिलने से किसी यात्री का 'वास्तविक यात्री'  होने का दर्जा खत्म नहीं होता। 
 न्यायालय ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट और रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के पुराने फैसलों को पलटते हुए ₹8 लाख का मुआवजा चार हफ्ते के भीतर देने का आदेश दिया है। 
 फैसले की मुख्य बातें और महत्व हलफनामे से साबित होगा दर्जा: पीड़ित परिवार शुरुआती तौर पर एक हलफनामा दायर कर यात्री के वास्तविक होने का दावा कर सकते हैं, जिसे केवल टिकट न होने के बहाने खारिज नहीं किया जा सकता। 
तकनीकी कमियां बाधा नहीं: अदालत ने कहा कि रेलवे एक सरकारी संस्था है और उसे तकनीकी खामियों या प्रक्रियाओं का हवाला देकर अपनी अनिवार्य जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए। देरी पर लगेगा ब्याज: तय सीमा (4 सप्ताह) के भीतर मुआवजे की राशि न देने पर रेलवे को 8% की दर से ब्याज भी चुकाना होगा। 'सेकंड क्लास' शब्द पर आपत्ति: सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे मैनुअल में इस्तेमाल होने वाले शब्द 'सेकंड क्लास पैसेंजर' को मानवीय गरिमा और संविधान की भावना के खिलाफ बताते हुए इसे 'सेकंड क्लास कोच' करने का सुझाव दिया।

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